Tuesday, October 4, 2011

क्षमा

आज सुबह एक सपना देखा
कहते है की सुबह का सपना सच्चा होता है
देखा की मेरा बेटा मेरे मुह में आग दे रहा है
मेरी माँ ने आकर मेरा हाथ थाम लिया है
शायद आज के हालात में
इससे अच्छा मेरे लिए कुछ हो नही सकता
अगर कोई चाहे भी तो
वापिस अब मुझे दुनिया में वापिस ला नही सकता
क्योंकि अब इस दुनिया से
मेरे दिल बुरी तरह उकता गया है
जिस चेहरे की तरफ देखो
हर कोई एक नकाब ओढ़े खड़ा है
हर शख्स अपनी
कुत्सित इच्छाओ और तमनाओ से घिरा
अपने स्वार्थो के दलदल में फंसा है
अब इन जहरीली हवाओ में
सांस भी कंहा आता है
हर तरफ हवाओं में
षड्यंत्र और नफरत का जहर भरा है
ऐसे में है ये प्रार्थना कि
जगत के मालिक अब तो मुझे वापिस बुला ले
बहुत कर चुका में अपने कर्मो का भुगतान
मेरे शेष अपराधो को अब तो क्षमा कर दे II

लेखक   प्रवीन चन्द्र झांझी

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