प्रायश्चित
शर्मिंदा थी हमारी पीढ़ी
कि समाज को हम सही दिशा दे ने सके
भौतिक प्रगति की राह पर भटक गये हम
विचारिक प्रगति पर ध्यान दे न सके
पर बचाने को हमे शर्मिंदगी से
अन्ना ह्ज्जारे आये है
दिखाने को राह भटके समाज को
एक नव चेतना की मशाल लाये है
उठो नौजवानों थामो इस मशाल को
अब इसे आगे बढाने की जिम्मेदारी तुम्हारी है
जब पूछेगा इतिहास तुमसे
की जब हो रही थी न्याय और अन्याय में जंग
तब तुम खड़े थे किसके संग
ये देने को जवाब अब तुम्हारी बारी है
याद रखो ! अन्ना एक व्यक्ति नही सिद्धांत है
मिट जाते है लोग, मिट जाती है सल्तनते
पर सिद्धांत कभी मिटा नही करते
चले जाते है लोग
आ जाते है कुछ और
पर सचाई के कारवां कभी रुका नही करते
कल अगर न रहे एक अन्ना तो क्या
करोड़ो अन्ना पैदा करने की
जिम्मेदारी भी अब तुम्हारी है II
लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी