शादी के बाद पत्नी को बेगम क्यों कहते है, क्योंकि शादी के बाद सारे गम पति के हो जाते है और पत्नी 'बेगम ' हो जाती है
Thursday, April 19, 2012
Thursday, April 12, 2012
अमर बेल
ये यादे भी बड़ी अजीब है
जाने के बाद ही पता नही क्यों आती है
बड़ी बेवफा है ये
हंसा हंसा कर जाने क्यों रुला जाती है
जब तक रहे साथ साथ हम
रही दूरिया हममे
पर दूर होने पर न जाने
ये आँखे तुम्हे ही क्यों ढूँढती रह जाती है
या तो हम नही समझ पाए तुमको
या तुमने हमे कभी समझना नही चाहा
क्यों हुआ ऐसा इस बात की कसक
हमारी उलझन को और बड़ा जाती है
पेढ़ समझ कर लिपट गयी तुम हमसे
भ्रमा दिया तुमने हमे अपने जिस्म की सुगंध से
और बहुत देर से समझे हम कि
लिपट कर बड़ जाए बेल कितनी ही
पर जड़े तो उसकी अपनी ही
जमीन में ही रह जाती है
जमीन में ही रह जाती है
मगर काश समझ पाती अगर तुम
कि जो बेल भूलकर जमीन को अपनी
हवा के सहारे पनप जाती है
और लिपटकर पेढ़ से
खुद से खुद को भूल जाती है
और लिपटकर पेढ़ से
खुद से खुद को भूल जाती है
सिर्फ वो बेल ही अंत में
अमर बेल कहलाती है
अमर बेल कहलाती है
लेखक : प्रवीण चन्द्र झांझी
Monday, March 12, 2012
Thursday, March 8, 2012
बुरा न मानो होली है
जनता ने होली का ऐसा रंग जमा दिया
युo पीo में साइकिल पर लिटा कर हाथी को
हाथ से कमल का फूल चढ़ा कर
सबको गंगा जी में डूबा दिया
पंज आब की धरती पर मार मार कर तीर
अपने तीर कमान से कमल का फूल खिला दिया
देव भूमि में जो बनाते थे तमाशा जनता का
अब उन्हें कुत्तो की तरह लड़ा दिया
गोवा के समुन्द्र में खिला है कमल पानी में
और डूबते जहाज ने अपना हाथ हिलाकर विदा लिया
वह री जनता क्या होली का मजा लिया II
जनता ने होली का ऐसा रंग जमा दिया
युo पीo में साइकिल पर लिटा कर हाथी को
हाथ से कमल का फूल चढ़ा कर
सबको गंगा जी में डूबा दिया
पंज आब की धरती पर मार मार कर तीर
अपने तीर कमान से कमल का फूल खिला दिया
देव भूमि में जो बनाते थे तमाशा जनता का
अब उन्हें कुत्तो की तरह लड़ा दिया
गोवा के समुन्द्र में खिला है कमल पानी में
और डूबते जहाज ने अपना हाथ हिलाकर विदा लिया
वह री जनता क्या होली का मजा लिया II
Sunday, March 4, 2012
हालात
कहते है लोग की शराब आदमी को तमीज भुला देती है,
मगर सच तो ये है कि ये वो माशूक है जो
कुछ पल के लिए ही सही पर
अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने का समा बना देती है,
जमाना जो न करता बेवफाई
तो शराब कि जरूरत ही क्यों पडती
करती हर शाम हमारा खड़ी होकर चौखट पर इन्तजार
तो हमारी मयखाने कि इस लालपरी पर नजर ही क्यों पडती
कहते है लोग कि न होती शराब
तो जमाने में ये बुराईया न होती
कहता हूँ मै कि जो न होती बुराईया जमाने में
तो शराब पीने कि नौबत न आती
बुराई शराब में नही
बुराई इस बात में है कि इंसान कि नीयत में खोट है
नही मिटा पाते अपने अंदर की नफरत को
उठाकर ऊँगली दूसरे की तरफ
असलियत से लेते मुंह मोड़ है
अब छोड़ो मत सोचो कि
पहले अंडा आया या मुर्गी आई
और इस बहस में मत उलझो
न करो शराब से और शराबी से नफरत ,
क्यों पीता है आदमी शराब उन हालात को बदलो II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
कहते है लोग की शराब आदमी को तमीज भुला देती है,
मगर सच तो ये है कि ये वो माशूक है जो
कुछ पल के लिए ही सही पर
अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने का समा बना देती है,
जमाना जो न करता बेवफाई
तो शराब कि जरूरत ही क्यों पडती
करती हर शाम हमारा खड़ी होकर चौखट पर इन्तजार
तो हमारी मयखाने कि इस लालपरी पर नजर ही क्यों पडती
कहते है लोग कि न होती शराब
तो जमाने में ये बुराईया न होती
कहता हूँ मै कि जो न होती बुराईया जमाने में
तो शराब पीने कि नौबत न आती
बुराई शराब में नही
बुराई इस बात में है कि इंसान कि नीयत में खोट है
नही मिटा पाते अपने अंदर की नफरत को
उठाकर ऊँगली दूसरे की तरफ
असलियत से लेते मुंह मोड़ है
अब छोड़ो मत सोचो कि
पहले अंडा आया या मुर्गी आई
और इस बहस में मत उलझो
न करो शराब से और शराबी से नफरत ,
क्यों पीता है आदमी शराब उन हालात को बदलो II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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