एक आदमी दवाई की दुकान पर गया और कहा "जहर दे दो "I दुकानदार ने कहा " पर्चा दिखाओ "I तो उसने शादी का कार्ड दिखा दिया I दुकानदार EMOTIONAL होकर बोला " बस कर रुलायेगा क्या ! बोल कौन सी शीशी चाहिये छोटी या बड़ी "
Monday, March 12, 2012
Thursday, March 8, 2012
बुरा न मानो होली है
जनता ने होली का ऐसा रंग जमा दिया
युo पीo में साइकिल पर लिटा कर हाथी को
हाथ से कमल का फूल चढ़ा कर
सबको गंगा जी में डूबा दिया
पंज आब की धरती पर मार मार कर तीर
अपने तीर कमान से कमल का फूल खिला दिया
देव भूमि में जो बनाते थे तमाशा जनता का
अब उन्हें कुत्तो की तरह लड़ा दिया
गोवा के समुन्द्र में खिला है कमल पानी में
और डूबते जहाज ने अपना हाथ हिलाकर विदा लिया
वह री जनता क्या होली का मजा लिया II
जनता ने होली का ऐसा रंग जमा दिया
युo पीo में साइकिल पर लिटा कर हाथी को
हाथ से कमल का फूल चढ़ा कर
सबको गंगा जी में डूबा दिया
पंज आब की धरती पर मार मार कर तीर
अपने तीर कमान से कमल का फूल खिला दिया
देव भूमि में जो बनाते थे तमाशा जनता का
अब उन्हें कुत्तो की तरह लड़ा दिया
गोवा के समुन्द्र में खिला है कमल पानी में
और डूबते जहाज ने अपना हाथ हिलाकर विदा लिया
वह री जनता क्या होली का मजा लिया II
Sunday, March 4, 2012
हालात
कहते है लोग की शराब आदमी को तमीज भुला देती है,
मगर सच तो ये है कि ये वो माशूक है जो
कुछ पल के लिए ही सही पर
अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने का समा बना देती है,
जमाना जो न करता बेवफाई
तो शराब कि जरूरत ही क्यों पडती
करती हर शाम हमारा खड़ी होकर चौखट पर इन्तजार
तो हमारी मयखाने कि इस लालपरी पर नजर ही क्यों पडती
कहते है लोग कि न होती शराब
तो जमाने में ये बुराईया न होती
कहता हूँ मै कि जो न होती बुराईया जमाने में
तो शराब पीने कि नौबत न आती
बुराई शराब में नही
बुराई इस बात में है कि इंसान कि नीयत में खोट है
नही मिटा पाते अपने अंदर की नफरत को
उठाकर ऊँगली दूसरे की तरफ
असलियत से लेते मुंह मोड़ है
अब छोड़ो मत सोचो कि
पहले अंडा आया या मुर्गी आई
और इस बहस में मत उलझो
न करो शराब से और शराबी से नफरत ,
क्यों पीता है आदमी शराब उन हालात को बदलो II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
कहते है लोग की शराब आदमी को तमीज भुला देती है,
मगर सच तो ये है कि ये वो माशूक है जो
कुछ पल के लिए ही सही पर
अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने का समा बना देती है,
जमाना जो न करता बेवफाई
तो शराब कि जरूरत ही क्यों पडती
करती हर शाम हमारा खड़ी होकर चौखट पर इन्तजार
तो हमारी मयखाने कि इस लालपरी पर नजर ही क्यों पडती
कहते है लोग कि न होती शराब
तो जमाने में ये बुराईया न होती
कहता हूँ मै कि जो न होती बुराईया जमाने में
तो शराब पीने कि नौबत न आती
बुराई शराब में नही
बुराई इस बात में है कि इंसान कि नीयत में खोट है
नही मिटा पाते अपने अंदर की नफरत को
उठाकर ऊँगली दूसरे की तरफ
असलियत से लेते मुंह मोड़ है
अब छोड़ो मत सोचो कि
पहले अंडा आया या मुर्गी आई
और इस बहस में मत उलझो
न करो शराब से और शराबी से नफरत ,
क्यों पीता है आदमी शराब उन हालात को बदलो II
लेखक : प्रवीन चन्द्र झांझी
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