Wednesday, June 5, 2013

कहानी
ये कैसी अजब कहानी है
नही पिला सकता 60 साल का बुढ्ढा किसी मंत्री को पानी
पर 80 साल की शीला कैसी कुर्सी की दीवानी है
83 साल में भी चाहते है बनना प्रधान मंत्री अडवाणी
और 80 साल के मनमोहन की है इच्छा की इस बार तो हेट्रिक बनानी है
"है ये कैसी अँधेरी नगरी चौपट राजा
टके सेर भाजी टके सेर खाजा "
आता है याद मुझे जो पढ़ा था वो दोहा था बड़ा सादा
पर लगता है सब भूल गये,कि  जाना है इक दिन सबको
चाहे हो वो रंक या चाहे हो  वो राजा
कबीर दास जी ठीक फरमा गये है
" मन मुआ न माया मुई, मिट मिट गये शरीर
इच्छा तृष्णा न मिटी कह गये दास कबीर"I
 
प्रवीन चन्द्र झांझी 

Thursday, April 19, 2012

शादी के बाद पत्नी को बेगम क्यों कहते है, क्योंकि शादी के बाद सारे गम पति के हो जाते है और पत्नी 'बेगम ' हो जाती है

Thursday, April 12, 2012

अमर बेल

ये यादे भी बड़ी अजीब है
जाने के बाद ही पता नही क्यों आती है
बड़ी बेवफा है ये
हंसा हंसा कर जाने क्यों रुला जाती है

जब तक रहे साथ साथ हम
रही दूरिया हममे
पर दूर  होने पर न जाने
ये आँखे तुम्हे ही क्यों ढूँढती रह जाती है  

या तो हम नही समझ पाए तुमको
या तुमने हमे कभी समझना नही चाहा
क्यों हुआ ऐसा इस  बात की कसक
हमारी उलझन को और बड़ा जाती है

पेढ़ समझ कर लिपट गयी तुम हमसे 
भ्रमा दिया तुमने हमे अपने जिस्म की सुगंध से  
और बहुत देर से समझे हम कि
लिपट कर बड़ जाए बेल कितनी ही
पर जड़े तो उसकी अपनी ही
जमीन में ही रह जाती है

मगर काश समझ पाती अगर तुम
कि जो बेल भूलकर जमीन को अपनी
हवा के सहारे पनप जाती है
और लिपटकर पेढ़ से
खुद से खुद को भूल जाती है  
सिर्फ वो बेल ही अंत में
अमर बेल कहलाती है

लेखक : प्रवीण चन्द्र झांझी    

Monday, March 12, 2012

एक आदमी दवाई की दुकान पर गया और कहा "जहर दे दो "I   दुकानदार ने कहा " पर्चा दिखाओ "I  तो उसने शादी का कार्ड दिखा दिया I  दुकानदार EMOTIONAL होकर बोला " बस कर रुलायेगा क्या ! बोल कौन सी शीशी चाहिये छोटी या बड़ी " 

Thursday, March 8, 2012

 बुरा न मानो होली है

जनता ने होली का ऐसा रंग जमा दिया
युo पीo में साइकिल पर लिटा कर हाथी को
हाथ से कमल का फूल चढ़ा कर
सबको गंगा जी में डूबा दिया
पंज आब की धरती पर मार मार कर तीर
अपने तीर कमान से कमल का फूल खिला दिया
देव भूमि में जो बनाते थे तमाशा जनता का
अब उन्हें कुत्तो की तरह लड़ा दिया
गोवा के समुन्द्र में खिला है कमल पानी में
और डूबते जहाज ने अपना हाथ हिलाकर विदा लिया
वह री जनता क्या होली का मजा लिया II

Sunday, March 4, 2012

हालात

कहते है लोग की शराब आदमी को तमीज भुला देती है,
मगर सच तो ये है कि ये वो माशूक है जो
कुछ पल के लिए ही सही पर
अपनी जिन्दगी अपने हिसाब से जीने का समा बना देती है,

जमाना जो न करता बेवफाई 
तो शराब कि जरूरत ही क्यों पडती 
करती हर शाम हमारा खड़ी होकर चौखट पर इन्तजार 
तो हमारी मयखाने कि इस लालपरी पर नजर ही क्यों पडती 

कहते है लोग कि न होती शराब
तो जमाने में ये बुराईया न होती
कहता हूँ मै कि जो न होती बुराईया जमाने में 
तो शराब पीने कि नौबत न आती 

बुराई शराब में नही 
बुराई इस बात में है कि इंसान कि नीयत में खोट है 
नही मिटा पाते अपने अंदर की नफरत को 
उठाकर ऊँगली दूसरे की तरफ 
असलियत से लेते मुंह मोड़ है

अब छोड़ो मत सोचो कि
पहले अंडा आया या मुर्गी आई
और इस बहस में मत उलझो
न करो शराब से और शराबी से नफरत ,
क्यों पीता है आदमी शराब उन हालात को बदलो II

लेखक :  प्रवीन चन्द्र झांझी   
    

Monday, October 17, 2011


निर्णय

जिन्दगी में कई ऐसे क्षण भी आते है
जब जिन्दगी और मौत आमने सामने खड़े हो जाते है
अक्सर इन्सान जाता है जिन्दगी के साथ
और फिर कुछ देर बाद
वैसे ही मुकाम पर फिर आकर खड़ा हो जाता है
मगर है ऐसी महबूबा  मौत 
 अगर चला जाए वो साथ उसके
तो वापिस वो पास जिन्दगी के कभी नही आता है

लेखक प्रवीन चन्द्र झांझी